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समस्तीपुर सदर अस्पताल में दलालों का साम्राज्य! इंजुरी रिपोर्ट से लेकर विकलांग प्रमाणपत्र तक के नाम पर खुलेआम वसूली, इलाज से ज्यादा रेफर की संस्कृति

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मोहम्मद आलम प्रधान संपादक 

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इलाज से ज्यादा रेफर की संस्कृति, अल्ट्रासाउंड सेवा बंद, सफाई व्यवस्था ध्वस्त — नए सिविल सर्जन के सामने व्यवस्था सुधारने की बड़ी चुनौती

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समस्तीपुर:जिले का सबसे बड़ा सरकारी स्वास्थ्य केंद्र माने जाने वाला समस्तीपुर सदर अस्पताल इन दिनों अपनी बदहाल व्यवस्था और भ्रष्ट तंत्र को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में है। यहां इलाज के लिए आने वाले मरीजों और उनके परिजनों को स्वास्थ्य सुविधा कम और अव्यवस्था, दलाली तथा रिश्वतखोरी का सामना ज्यादा करना पड़ रहा है। अस्पताल परिसर में व्याप्त अराजक स्थिति ने आम लोगों के बीच सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की साख पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।

सूत्रों और मरीजों के परिजनों से मिली जानकारी के अनुसार अस्पताल में इंजुरी रिपोर्ट (चोट का मेडिकल प्रमाण) बनाने के नाम पर कर्मचारियों द्वारा खुलेआम रिश्वत मांगी जा रही है। पीड़ितों का आरोप है कि मामूली कागजी प्रक्रिया पूरी करने के लिए भी पांच हजार से लेकर दस हजार रुपये तक की मांग की जाती है। पैसे नहीं देने पर रिपोर्ट में देरी या तकनीकी अड़चन का हवाला देकर लोगों को घंटों-घंटों तक दौड़ाया जाता है।

इतना ही नहीं, विकलांगता प्रमाण पत्र बनाने की प्रक्रिया भी कथित तौर पर दलालों और कर्मचारियों के गठजोड़ का शिकार बन चुकी है। आरोप है कि विकलांग सर्टिफिकेट बनवाने के लिए तीन हजार से लेकर पांच हजार रुपये तक की अवैध वसूली की जाती है। गरीब और जरूरतमंद लोग, जिन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए, वे ही इस अवैध वसूली का सबसे बड़ा शिकार बन रहे हैं।

इलाज कम, रेफर ज्यादा

सदर अस्पताल में आने वाले मरीजों का कहना है कि यहां इलाज की व्यवस्था कमजोर होने के कारण अधिकांश मामलों में डॉक्टर मरीजों को सीधे बड़े अस्पतालों के लिए रेफर कर देते हैं। इससे गरीब मरीजों की परेशानी और बढ़ जाती है। जिला अस्पताल में जहां प्राथमिक उपचार की बेहतर व्यवस्था होनी चाहिए, वहां मरीजों को मजबूर होकर निजी अस्पतालों या दूसरे जिलों का रुख करना पड़ता है।

सफाई व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त

अस्पताल परिसर की सफाई व्यवस्था भी बदहाल बताई जा रही है। अस्पताल के गेट से लेकर वार्ड तक कई जगह गंदगी और अव्यवस्था का आलम देखने को मिलता है। मरीजों और उनके परिजनों का कहना है कि स्वच्छता की कमी के कारण संक्रमण का खतरा भी बना रहता है।

स्वास्थ्य विभाग की ओर से स्वच्छता और व्यवस्था को लेकर समय-समय पर निर्देश जारी किए जाते हैं, लेकिन जमीन पर स्थिति इसके उलट दिखाई देती है।

अस्पताल में दलालों का कब्जा

सबसे गंभीर आरोप यह है कि अस्पताल परिसर में दलालों का एक पूरा नेटवर्क सक्रिय है। अस्पताल के गेट से लेकर अंदर तक कई लोग मरीजों को घेर लेते हैं और अलग-अलग काम कराने के नाम पर उनसे पैसे ऐंठते हैं। बताया जाता है कि ये दलाल मरीजों को यह भरोसा दिलाते हैं कि बिना उनके सहयोग के अस्पताल में कोई काम नहीं होगा।

कई स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों से यह स्थिति बनी हुई है और अस्पताल प्रशासन इसे रोकने में नाकाम रहा है। आरोप यह भी लगाया जा रहा है कि पूर्व सिविल सर्जन की लापरवाही के कारण अस्पताल में दलालों का यह नेटवर्क और मजबूत हो गया।

स्टाफ की कमी से सेवाएं प्रभावित

अस्पताल में कर्मचारियों और तकनीकी स्टाफ की कमी भी बड़ी समस्या बनी हुई है। जानकारी के अनुसार अल्ट्रासाउंड जैसी महत्वपूर्ण जांच सेवा लंबे समय से बंद पड़ी है, क्योंकि इसके संचालन के लिए आवश्यक स्टाफ उपलब्ध नहीं है। इससे मरीजों को बाहर निजी जांच केंद्रों का सहारा लेना पड़ रहा है, जहां उन्हें अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ता है।अस्पताल आने वाले कई मरीजों और उनके परिजनों का यह भी कहना है कि कुछ सरकारी डॉक्टर अस्पताल में अपेक्षित समय नहीं देते हैं। आरोप है कि कई डॉक्टर अस्पताल की ड्यूटी के बाद या कभी-कभी ड्यूटी समय में भी अपने निजी क्लिनिक पर ज्यादा समय देते हैं, जिसके कारण सदर अस्पताल में मरीजों को डॉक्टरों की उपलब्धता को लेकर परेशानी का सामना करना पड़ता है। हालांकि इस संबंध में आधिकारिक तौर पर कोई पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन मरीजों के बीच यह चर्चा आम है कि यदि अस्पताल में डॉक्टर नियमित रूप से पर्याप्त समय दें तो इलाज की व्यवस्था में काफी सुधार हो सकता है।

पक्ष जानने की कोशिश:

इस संबंध में जब मामले को लेकर डॉ. राजीव कुमार से संपर्क करने की कोशिश की गई तो उनसे सीधा संपर्क नहीं हो सका। हालांकि स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यदि अस्पताल में दलालों की सक्रियता, अवैध वसूली या व्यवस्था में लापरवाही की शिकायत मिलती है तो इसकी जांच कर दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी।

समस्तीपुर सदर अस्पताल: व्यवस्था की बीमारी का इलाज कब?

समस्तीपुर जिले के लाखों लोगों के लिए जीवनरेखा माने जाने वाला समस्तीपुर सदर अस्पताल इन दिनों जिस स्थिति से गुजर रहा है, वह केवल एक अस्पताल की समस्या नहीं बल्कि पूरी सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। जिला मुख्यालय का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल यदि बदहाल हो जाए, तो इसका सीधा असर उन गरीब और जरूरतमंद लोगों पर पड़ता है जिनके पास निजी अस्पतालों में इलाज कराने की क्षमता नहीं होती।

सरकारी अस्पतालों की स्थापना का उद्देश्य यह था कि आम जनता को कम खर्च या निःशुल्क बेहतर इलाज मिल सके। लेकिन जब अस्पतालों में इलाज से ज्यादा अव्यवस्था, दलाली और कथित भ्रष्टाचार की चर्चा होने लगे, तो यह चिंता का विषय बन जाता है। यदि किसी मरीज को इंजुरी रिपोर्ट बनवाने या विकलांगता प्रमाणपत्र प्राप्त करने जैसे कामों के लिए भी परेशानी उठानी पड़े, तो यह व्यवस्था की गंभीर विफलता को दर्शाता है।

इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि कई बार अस्पताल परिसर में दलालों की सक्रियता की शिकायतें सामने आती हैं। यदि किसी सरकारी अस्पताल में दलालों का नेटवर्क सक्रिय हो जाए तो यह न केवल प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाता है बल्कि यह भी बताता है कि व्यवस्था की निगरानी कहीं न कहीं कमजोर पड़ गई है। ऐसे हालात में सबसे ज्यादा नुकसान उस गरीब मरीज को उठाना पड़ता है जो उम्मीद लेकर अस्पताल आता है।

एक और गंभीर सवाल डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता को लेकर भी उठता है। सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त समय तक डॉक्टरों की मौजूदगी सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। यदि मरीजों को डॉक्टरों के इंतजार में घंटों बैठना पड़े या छोटी-छोटी बीमारियों में भी उन्हें दूसरे अस्पतालों के लिए रेफर किया जाए, तो इससे सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है।

यह भी सच है कि किसी भी अस्पताल की व्यवस्था केवल डॉक्टरों से नहीं चलती। इसमें प्रशासनिक निगरानी, पर्याप्त स्टाफ, साफ-सफाई की व्यवस्था, जांच सुविधाएं और मरीजों के प्रति संवेदनशील व्यवहार जैसी कई चीजें शामिल होती हैं। यदि इन सभी पहलुओं पर एक साथ ध्यान नहीं दिया जाए तो अस्पताल धीरे-धीरे अव्यवस्था का शिकार हो जाता है।

समस्तीपुर सदर अस्पताल की वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह आवश्यक हो गया है कि स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन इस पूरे मामले को गंभीरता से लें। अस्पताल परिसर से दलालों की सक्रियता पर रोक लगाने, स्टाफ की कमी को दूर करने, जांच सुविधाओं को सुचारु करने और साफ-सफाई की व्यवस्था सुधारने जैसे कदम तुरंत उठाने होंगे।

हाल ही में जिले के नए सिविल सर्जन के रूप में डॉ. राजीव कुमार ने पदभार संभाला है। ऐसे में जनता की उम्मीदें स्वाभाविक रूप से उनसे जुड़ी हुई हैं। यह उनके लिए एक बड़ी चुनौती भी है और अवसर भी—चुनौती इसलिए कि वर्षों से चली आ रही समस्याओं को ठीक करना आसान नहीं होता, और अवसर इसलिए कि यदि वे सख्त और प्रभावी कदम उठाते हैं तो अस्पताल की व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।

अंततः सवाल केवल एक अस्पताल का नहीं है। यह सवाल उस भरोसे का है जो आम जनता सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर करती है। यदि यह भरोसा कमजोर पड़ता है तो लोग मजबूर होकर महंगे निजी अस्पतालों की ओर रुख करते हैं, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों की मुश्किलें और बढ़ जाती हैं।

समय की मांग है कि समस्तीपुर सदर अस्पताल की व्यवस्था में व्यापक सुधार किया जाए, ताकि यह अस्पताल सच मायने में जनता के लिए राहत और भरोसे का केंद्र बन सके। जब तक व्यवस्था की इस बीमारी का इलाज नहीं होगा, तब तक स्वास्थ्य सेवा का उद्देश्य अधूरा ही रहेगा।

नए सिविल सर्जन के सामने बड़ी चुनौती

हाल ही में जिले के नए सिविल सर्जन डॉ. राजीव कुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती इसी सदर अस्पताल की व्यवस्था को सुधारने की मानी जा रही है। आम लोगों की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या नए सिविल सर्जन अस्पताल को दलालों और भ्रष्ट तंत्र से मुक्त कर पाते हैं या फिर यह व्यवस्था पहले की तरह ही चलती रहेगी।

स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े जानकारों का कहना है कि अगर अस्पताल में दलालों की भूमिका खत्म करनी है तो प्रशासन को सख्त कदम उठाने होंगे। अस्पताल परिसर में निगरानी, शिकायत व्यवस्था को मजबूत करना और दोषी कर्मचारियों पर कार्रवाई जरूरी है।

जनता के भरोसे की परीक्षा

समस्तीपुर का सदर अस्पताल जिले के लाखों लोगों के लिए सबसे बड़ा सरकारी इलाज केंद्र है। ऐसे में यहां की व्यवस्था सुधरना बेहद जरूरी है। अब यह देखना होगा कि जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग इस गंभीर मामले पर क्या कदम उठाते हैं और क्या वास्तव में मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मिल पाती है।

फिलहाल सवाल यही है कि क्या नए सिविल सर्जन डॉ. राजीव कुमार इस बदहाल व्यवस्था को सुधारने में सफल होंगे, या फिर सदर अस्पताल की कहानी पहले की तरह ही दलालों और अव्यवस्था के साए में चलती रहेगी।

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